त्रासदी – एक शाम के बाद
- anasuyaray
- 6 days ago
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दोस्तों ने कहा, देख के आ — बहुत बेदर्द है
यह माँ-बेटे की कहानी।
तो चली गई मैं एक शुक्रवार की शाम
त्रासदी के बुलावे पर।
स्टेज के एक कोने में, लैंप शेड के तले,
एक हॉट प्लेट पर कॉफी रखी थी,
एक किताब — बाइबल जैसी लाल,
एक शीशे की बोतल पानी से भरी हुई,
और एक प्याला।
हाँ, एक चश्मा भी।
दूसरे कोने पर
एक अकेली कुर्सी।
मानव कौल जल्दी ही आ गए।
हॉट प्लेट ऑन की,
कॉफी बनाई,
और कुर्सी पर बैठ कर
पीने लगे।
धीरे धीरे ऑडिटोरियम भर गया।
फिर सूचना के बाद
उन्होंने हमसे
अपना बचपन का नाम पूछा।
मैंने कभी इतना कोमल नाम न सुना था।
कोपल।
वो नन्हे से, मासूम से पत्ते
जिन पर पानी भी
सहमे सहमे कर ठहर जाता है।
कोपल और माँ का ताना-बाना —
मनमानी, कहानी, कल्पनाएँ और सच।
माँ की समझदारी
और कोपल का बचपना।
माँ उसे समझाती इंसानियत,
और दुनिया उसे बनाती मर्द।
भगवान ने भी
कुछ बखेड़ा खड़ा किया।
हवाई जहाज
और कोपल
दोनों ही दूर हो गए माँ से।
पेड़े से बताशों के दिन भी
अब गिनती में कम रह गए।
नाटक खत्म हो चुका था।
हम घर लौट आए थे।
फिर भी मैं सोचती रही —
क्या हैं ये रिश्ते
जिनसे हम इतना कुछ माँगते हैं,
इतनी अपेक्षा रखते हैं?
जो हमें बनाते हैं,
बिगाड़ते हैं,
चमकाते हैं,
और कभी कभी
अंदर ही अंदर
तोड़ देते हैं।
कोपल शायद
कभी बड़ा ही नहीं हुआ।
माँ को कभी कह न पाया
कि वह उससे कितना चाहता था,
और माँ का प्यार
समझने की उम्र भी
शायद उस तक पहुँच ही न पाई।
इसलिए शायद
त्रासदी लिखी गई।
अगर वह कह पाता —
अगर वह समझ पाता —
तो शायद
यह नाटक नहीं,
एक किताब होती।
पहले पन्ने पर लिखा होता
माँ के नाम।
और फिर
चुपचाप
माँ की गोदी में
जाकर टिक जाती —
बिल्कुल उसी तरह
जैसे कोपल पर
पानी की बूँद
सहमे सहमे कर ठहर जाती है।









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